2008/05/29

'हमारी अपनी सुरक्षा प्रणाली और उसके जुझारू सैनिक'-1

हमारी अपनी सुरक्षा प्रणाली और
उसके जुझारू सैनिक-1
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वैसे तो पौराणिक ग्रंथ महाभारत और उसमें वर्णित अद्भुत दिव्य अलौकिक शक्तियों से युक्त तमाम नायक-नायिकाओं की जानकारी हममें से अधिकांश को है ही, लेकिन यहाँ इस ग्रंथ के एक महानायक कर्ण का उल्लेख करना प्रासंगिक है। यह तथाकथित सूर्य-पुत्र विशिष्ट प्रकार के कवच एवं कुंडल के साथ ही पैदा हुआ था। कवच इसकी त्वचा एवं कुंडल उसके कान के अभिन्न हिस्से थे। इनके रहते इस पर किसी अस्त्र-शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। कर्ण को युद्ध में हराने एवं मारने के लिए स्वयं इंद्र को उसके पास जाकर इस सुरक्षा प्रणाली का दान माँगना पड़ा था। कितना भाग्यशाली था न कर्ण?

लेकिन उससे ईर्ष्या करने और अफ़सोस करने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ हम साधारण मनुष्यों के पास भले ही न हों, लेकिन प्रकृति हम पर भी काफ़ी मेहरबान है। प्रकृति ने हमें भी एक मज़बूत सुरक्षा प्रणाली प्रदान कर रखी है। यह प्रणाली नाना प्रकार के घातक अस्त्र-शस्त्रों के प्रति भले ही अभेद्य न हो, परंतु तमाम प्रकार के सामान्य या फिर घातक रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं से लगातार हमारी रक्षा करने का प्रयास करती रहती है और इस प्रयास में अक्सर सफल भी रहती है। यह सुरक्षा प्रणाली, जिसे प्रतिरोधक तंत्र के नाम से जाना जाता है, सदैव सक्रिय रहती है और अपना काम इतने चुपचाप तरीक़े से करती रहती है कि हमें इसका भान भी नहीं होता है। विज्ञानवार्ता में इसी तंत्र को समझने-बूझने का प्रयास किया जाएगा।

अगर मैं यह कहूँ कि इस प्रतिरोधक तंत्र में अर्धसैनिक-बल से ले कर तरह-तरह के हरबा-हथियारों से लैस, आमने-सामने की लड़ाई में दक्ष सैनिकों के दस्ते, नाना प्रकार के रसायनिक हथियारों को स्वयं ही संश्लेषित करने एवं उनका उपयोग करने की क्षमता से लैस उच्चकोटि के तकनीकि सैनिक-बल एवं यहाँ तक कि मरे हुए सैनिक भी इस सुरक्षा प्रणाली में शामिल हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वास्तव में, ये सैनिक बल और कोई नहीं हमारी अपनी कोशिकाएँ ही हैं जो अलग-अलग विशिष्टताओं से लैस होती हैं। आखिरकार सूक्ष्म जीवाणुओं से लड़ने के लिए सूक्ष्म कोशिकाएँ ही कारगर हो सकती हैं न। बड़े-बड़े विशालकाय योद्धा भला किस काम के! इस प्रणाली की संरचना कैसी है और यह कैसे काम करती है, आइए अब इसे समझा जाए।

इस प्रणाली का एक हिस्सा हमें जन्म के साथ विरासत में मिलता है और दूसरा हिस्सा हम जन्म के बाद नाना प्रकार के जीवाणुओं का सामना करते हुए अर्जित करते हैं। नैसर्गिक (INNATE) अथवा जन्म से मिली सुरक्षा प्रणाली लगभग सभी प्रकार के जीवाणुओं या फिर अन्य प्रकार के अनजाने, अनचीन्हे पदार्थों का शरीर में प्रवेश अवरुद्ध करने का प्रयास करती है। इस नाकेबंदी के बाद भी यदि बाहरी तत्व शरीर में प्रवेश कर पाने में सफल हो जाते हैं तो इसी प्रणाली के अन्य अवयव उन्हें तुरंत मार डालने या फिर कम से कम उन्हें निष्क्रिय करने का प्रयास अवश्य करते हैं। हमारे शरीर की खूबसूरत त्वचा एवं आंतरिक अंगों की अंदरूनी सतह का निर्माण करने वाला एंडोथीलियल मेंब्रेन, इस प्रणाली के महत्वपूर्ण अवयव हैं। ये दोनों ही सीमा पर तैनात सजग प्रहरियों के समान सदैव सक्रिय रहते हैं। सबसे पहले तो ये विदेशी तत्वों को शरीर में घुसने ही नहीं देते यदि वे किसी तरह घुस भी गए तो उन्हें पकड़ना और बाहर खदेड़ना भी इनके ज़िम्मे है। त्वचा का बाहरी हिस्सा लाखों-करोड़ों कोशिकाओं की कई परतों का बना होता है। इसकी सबसे भीतरी परत की कोशिकाओं में ही विभाजन की क्षमता होती है एवं यह प्रक्रिया इनमें सदैव चलती रहती है। इस प्रकार नवनिर्मित कोशिकाएँ पुरानी कोशिकाओं की परतों को बाहर की ओर ठेलती रहती हैं। जैसे-जैसे पुरानी परतें बाहर की ओर आती हैं, इनकी कोशिकाएँ चिपटी होती जाती हैं एवं इनके अंदर पाया जाने वाला एक विशेष प्रोटीन अघुलनशील किरैटिन में बदलता जाता है। त्वचा की बाहरी सतह तक आते-आते ये कोशिकाएँ मृतप्राय: हो जाती हैं और सूख कर त्वचा से अलग होती रहती हैं। इन किरैटिनयुक्त मृतप्राय: कोशिकाओं को जीवाणुओं के लिए भेद पाना मुश्किल होता है और यदि इसे भेदने में ये सफल भी हो जाते हैं तो जब तक ये त्वचा की भीतरी परतों में प्रवेश करें, इन्हें मृतप्राय: कोशिकाओं के साथ शरीर से अलग कर दिया जाता है। यही नहीं, यह त्वचा हमें गर्मी-सर्दी के साथ-साथ वातावरण के तमाम हानिकारक अवयवों यथा रेडिएशन, अम्लीय, क्षारीय वस्तुओं के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है।


[जारी है..........]

आप को ये लेख कैसे लग रहे हैं......

आप के विचारों का इंतज़ार रहेगा...

धन्यवाद..


2 comments:

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

हम पढ रहे है। आप लिखते रहे। ऐसे ब्लागो की सचमुच कमी है। शुभकामनाए।

Dr.G.D.Pradeep said...

पंकज जी...पिछले लेखों पर कोई टिप्पणी नहीं मिली थी तो लगा शायद विज्ञान लेखों के पाठक नहीं हैं
आप की टिप्पणी ने उत्साह वर्धन किया ..बहुत बहुत धन्यवाद..